हनुमान चालीसा हिन्दी में

इस पृष्ठ पर पूरी हनुमान चालीसा है, आरम्भ के दो दोहों से लेकर चालीस चौपाइयों और अन्त के दोहे तक, और हर छन्द के साथ उसका सरल हिन्दी अर्थ। साथ में जानिए कि चालीसा किसने और किस भाषा में रची, इसमें हनुमान के कौन-से नाम और कथाएँ आती हैं, और लोग इसका पाठ कब और कैसे करते हैं।

संस्करण:
अंग्रेज़ी विकिपीडिया के हनुमान चालीसा लेख में दिया गया पूरा पाठ (२३ दिसम्बर २०१३ का संस्करण), जो रामभद्राचार्य के तय किए पाठ का अनुसरण करता है; यहाँ का पाठ उससे पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है।
लिखा गया

हनुमान चालीसा: पूरा पाठ

नीचे चालीसा के तैंतालीस छन्द क्रम से दिए गए हैं: आरम्भ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अन्त का दोहा। पाठ उसी रूप में है जैसा स्रोत में है, इसलिए कुछ जगह शब्द आपके गुटके से अलग हो सकते हैं; ऐसे जाने-माने अन्तर उस छन्द के अर्थ में बताए गए हैं।

संस्करण: अंग्रेज़ी विकिपीडिया, २३ दिसम्बर २०१३ का संस्करण (रामभद्राचार्य का पाठ)

  1. आरम्भ का दोहा १

    श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि।

    बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

    अर्थ: गुरु के चरण-कमलों की धूल (रज) से कवि अपने मन रूपी दर्पण (मुकुर) को निर्मल करता है और फिर राम (रघुबर) के उजले यश का बखान शुरू करता है, जो चारों फल, यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, देने वाला माना गया है।

  2. आरम्भ का दोहा २

    बुद्धिहीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार।

    बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार॥

    अर्थ: अपने को बुद्धिहीन मानकर कवि पवनकुमार, यानी पवन देव के पुत्र हनुमान, का स्मरण करता है। वह तीन चीज़ें माँगता है, बल, बुद्धि और विद्या, और विनती करता है कि हनुमान उसके क्लेश (कलेस) और मन के विकार दूर करें।

  3. चौपाई १

    जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

    जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

    अर्थ: पहली चौपाई दो जयकारों से बनी है। हनुमान को ज्ञान और गुणों का सागर कहा गया है, और 'कपीस', यानी कपियों (वानरों) के स्वामी, जिनकी कीर्ति तीनों लोकों में उजागर है। तीन लोकों से आशय आम तौर पर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल से है।

  4. चौपाई २

    राम दूत अतुलित बल धामा।

    अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥

    अर्थ: हनुमान राम के दूत हैं और ऐसे बल के धाम, जिसकी कोई तुलना नहीं। यहाँ उनके दो नाम आते हैं: अंजनि पुत्र, क्योंकि उनकी माता अंजना थीं, और पवनसुत, क्योंकि कथाओं में पवन देव को उनका पिता माना गया है।

  5. चौपाई ३

    महाबीर बिक्रम बजरंगी।

    कुमति निवार सुमति के संगी॥

    अर्थ: महाबीर यानी महान वीर, और बिक्रम यानी पराक्रमी। 'बजरंगी' वज्र-अंगी से बना माना जाता है, यानी जिसका शरीर वज्र जैसा कठोर हो। हनुमान कुमति, यानी बुरी बुद्धि, को दूर करते हैं और सुमति, यानी अच्छी समझ रखने वालों, के साथी हैं।

  6. चौपाई ४

    कंचन बरन बिराज सुबेसा।

    कानन कुंडल कुंचित केसा॥

    अर्थ: यहाँ हनुमान के रूप का वर्णन है: सोने जैसा रंग (कंचन बरन), सुन्दर वेश, कानों में कुण्डल और घुँघराले (कुंचित) बाल। ध्यान दें कि 'कानन' का अर्थ यहाँ जंगल नहीं, कान है।

  7. चौपाई ५

    हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

    काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

    अर्थ: हनुमान के हाथों में वज्र और ध्वजा शोभित हैं, और कन्धे पर मूँज घास का बना जनेऊ सजा है। कई व्याख्याकार 'बज्र' को वज्र जैसी कठोर गदा के अर्थ में भी लेते हैं, जो हनुमान की मूर्तियों और चित्रों में अक्सर दिखती है।

  8. चौपाई ६

    शंकर सुवन केसरी नंदन।

    तेज प्रताप महा जग बंदन॥

    अर्थ: हनुमान को यहाँ 'शंकर सुवन', यानी शिव का पुत्र, और 'केसरी नंदन', यानी वानर केसरी का बेटा, कहा गया है। परम्परा में हनुमान को शिव का अंश या रुद्र का अवतार माना जाता है। उनका तेज और प्रताप इतना बड़ा है कि सारा जगत उनकी वन्दना करता है।

  9. चौपाई ७

    बिद्यावान गुनी अति चातुर।

    राम काज करिबे को आतुर॥

    अर्थ: हनुमान विद्वान हैं, गुणी हैं और बहुत चतुर भी, पर उनकी सारी योग्यता राम के काम के लिए है, जिसे करने को वे हमेशा आतुर रहते हैं। वाल्मीकि रामायण में राम उनकी बोली सुनकर ही समझ जाते हैं कि वे वेदों और व्याकरण के जानकार हैं।

  10. चौपाई ८

    प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

    राम लखन सीता मन बसिया॥

    अर्थ: हनुमान को प्रभु राम की कथा सुनने में रस आता है, वे उसके 'रसिया' हैं, और राम, लक्ष्मण और सीता उनके मन में बसते हैं। इसी से यह मान्यता जुड़ी है कि जहाँ राम-कथा होती है, वहाँ हनुमान किसी न किसी रूप में मौजूद रहते हैं।

  11. चौपाई ९

    सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

    बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

    अर्थ: लंका में हनुमान ने छोटा-सा (सूक्ष्म) रूप धरकर सीता को दर्शन दिए, और फिर विकराल (बिकट) रूप धरकर लंका जला दी। कथा के अनुसार रावण के आदेश पर उनकी पूँछ में आग लगाई गई थी, और उसी आग से उन्होंने नगर को जला डाला।

  12. चौपाई १०

    भीम रूप धरि असुर सँहारे।

    रामचन्द्र के काज सँवारे॥

    अर्थ: भीम का अर्थ है भयानक। भयंकर रूप धरकर हनुमान ने राक्षसों का संहार किया और रामचन्द्र के काम सँवारे, यानी पूरे किए। अशोक वाटिका उजाड़ने से लेकर लंका के युद्ध तक की कथाएँ इसी ओर इशारा करती हैं।

  13. चौपाई ११

    लाय सँजीवनि लखन जियाए।

    श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥

    अर्थ: युद्ध में शक्ति लगने से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे। हनुमान संजीवनी बूटी लाए और लक्ष्मण को फिर से जीवन दिया, जिससे प्रसन्न होकर राम (रघुबीर) ने उन्हें गले लगा लिया। कथा कहती है कि बूटी पहचान न पाने पर वे पूरा पर्वत ही उठा लाए थे।

  14. चौपाई १२

    रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।

    तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

    अर्थ: राम (रघुपति) ने हनुमान की बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भाई भरत के समान प्रिय हो। भरत राम-कथा में सबसे समर्पित भाई माने जाते हैं, इसलिए यह तुलना राम के गहरे स्नेह को दिखाती है। कुछ लोग 'भाई' को सम्बोधन मानकर पढ़ते हैं।

  15. चौपाई १३

    सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

    अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

    अर्थ: 'सहस बदन' यानी हज़ार मुखों वाले; इसे प्रायः शेषनाग के लिए माना जाता है, हालाँकि कुछ लोग इसका अर्थ हज़ारों लोग करते हैं। राम कहते हैं कि सहस्र मुख भी तुम्हारा यश गाएँगे, और यह कहकर श्रीपति (लक्ष्मीपति, यहाँ राम) हनुमान को गले लगाते हैं।

  16. चौपाई १४

    सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

    नारद सारद सहित अहीसा॥

    अर्थ: यह चौपाई अगली चौपाई के साथ मिलकर एक बात कहती है। इसमें उन महान नामों की सूची है जो हनुमान का यश गाते हैं: सनक आदि चार कुमार, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद, सरस्वती (सारद) और अहीसा, यानी नागों के स्वामी।

  17. चौपाई १५

    जम कुबेर दिक्पाल जहाँ ते।

    कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥

    अर्थ: सूची आगे बढ़ती है: यम, कुबेर और दिशाओं के रक्षक देवता (दिक्पाल) भी जब हनुमान की पूरी महिमा नहीं कह पाते, तो धरती के कवि और विद्वान (कोबिद) उसे कहाँ तक कह सकेंगे? यहाँ कवि अपनी सीमा स्वीकार करता है।

  18. चौपाई १६

    तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

    राम मिलाय राजपद दीन्हा॥

    अर्थ: हनुमान ने सुग्रीव पर बड़ा उपकार किया: उन्हें राम से मिलाया और इस तरह राजपद दिलाया। कथा में सुग्रीव अपने भाई बाली के डर से ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे; राम से मित्रता के बाद बाली मारा गया और सुग्रीव किष्किन्धा के राजा बने।

  19. चौपाई १७

    तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना।

    लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

    अर्थ: रावण के भाई विभीषण ने हनुमान का मन्त्र, यानी सलाह, मानी और राम की शरण में गए। इसका फल सारा जगत जानता है: वे लंका के राजा (लंकेश्वर) बने। हनुमान और विभीषण की पहली भेंट लंका में ही हुई थी, जब हनुमान सीता को खोज रहे थे।

  20. चौपाई १८

    जुग सहस्र जोजन पर भानू।

    लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

    अर्थ: यह हनुमान के बचपन की प्रसिद्ध कथा है। हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य (भानु) को उन्होंने मीठा फल समझा और निगल (लील) लिया। 'जुग सहस्र जोजन' सूर्य की बहुत बड़ी दूरी का वर्णन है। कथा के अनुसार इसी प्रसंग में इन्द्र के वज्र से उनकी ठुड्डी (हनु) पर चोट लगी थी।

  21. चौपाई १९

    प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

    जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

    अर्थ: राम ने सीता को पहचान दिलाने के लिए अपनी अँगूठी (मुद्रिका) हनुमान को दी थी। उसे मुँह में रखकर हनुमान समुद्र (जलधि) लाँघ गए। कवि कहता है कि हनुमान जैसे वीर के लिए इसमें कोई अचरज नहीं।

  22. चौपाई २०

    दुर्गम काज जगत के जेते।

    सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

    अर्थ: संसार में जितने (जेते) भी कठिन काम हैं, हनुमान के अनुग्रह से वे उतने (तेते) ही सरल हो जाते हैं, ऐसी भक्तों की आस्था है। यहाँ से चालीसा का स्वर कथा-वर्णन से हटकर भक्त के जीवन में हनुमान की कृपा की ओर मुड़ता है।

  23. चौपाई २१

    राम दुआरे तुम रखवारे।

    होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

    अर्थ: हनुमान राम के द्वार के रखवाले हैं, और उनकी आज्ञा के बिना वहाँ प्रवेश (पैसार) नहीं होता। भक्त इसका भाव यह लेते हैं कि राम तक पहुँचने का रास्ता हनुमान की भक्ति से होकर जाता है।

  24. चौपाई २२

    सब सुख लहै तुम्हारी शरना।

    तुम रक्षक काहू को डर ना॥

    अर्थ: जो हनुमान की शरण में आता है, वह सब सुख पाता (लहै) है; और जब रक्षक स्वयं हनुमान हों, तो किसी का डर नहीं रहता। यह चौपाई भक्त के इसी भरोसे को शब्द देती है।

  25. चौपाई २३

    आपन तेज सम्हारो आपै।

    तीनौं लोक हाँक ते काँपै॥

    अर्थ: हनुमान का तेज इतना प्रचण्ड है कि उसे सँभालना केवल उन्हीं के बस में है। उनकी एक हाँक, यानी गर्जना, से तीनों लोक काँप उठते हैं। 'आपै' का अर्थ है स्वयं आप।

  26. चौपाई २४

    भूत पिशाच निकट नहिं आवै।

    महाबीर जब नाम सुनावै॥

    अर्थ: भक्तों की मान्यता है कि जब कोई महाबीर हनुमान का नाम लेता है, तो भूत-पिशाच जैसी बुरी शक्तियाँ पास नहीं आतीं। इसी आस्था के कारण बहुत-से लोग डर लगने पर, ख़ासकर रात में, हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं।

  27. चौपाई २५

    नासै रोग हरै सब पीरा।

    जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

    अर्थ: इस चौपाई के अनुसार वीर हनुमान का निरन्तर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है। यह आस्था का कथन है; बहुत-से लोग बीमारी या कठिन समय में पाठ से मन का बल पाते हैं, पर इसे इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

  28. चौपाई २६

    संकट तें हनुमान छुड़ावै।

    मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

    अर्थ: जो मन, कर्म (क्रम) और वचन, तीनों से हनुमान में ध्यान लगाता है, उसे वे संकट से छुड़ाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है। 'मन क्रम बचन' का भाव है कि भक्ति केवल ज़ुबान से नहीं, विचार और आचरण से भी हो।

  29. चौपाई २७

    सब पर राम तपस्वी राजा।

    तिन के काज सकल तुम साजा॥

    अर्थ: राम सबसे ऊपर हैं, और वे तपस्वी राजा हैं, यानी राजा होकर भी तपस्वी की तरह संयम से रहने वाले। ऐसे राम के सारे काम हनुमान ने सँवारे (साजा)। वनवास में वल्कल पहनकर रहने वाले राम की छवि भी इस विशेषण में झलकती है।

  30. चौपाई २८

    और मनोरथ जो कोई लावै।

    तासु अमित जीवन फल पावै॥

    अर्थ: जो कोई भी कोई कामना (मनोरथ) लेकर हनुमान के पास आता है, वह जीवन में उसका असीम (अमित) फल पाता है, ऐसी आस्था है। यहाँ 'तासु', यानी उसका, पढ़ा गया है; कई लोकप्रिय संस्करणों में 'सोइ', यानी वही, मिलता है। अर्थ लगभग एक ही रहता है।

  31. चौपाई २९

    चारों जुग परताप तुम्हारा।

    है परसिद्ध जगत उजियारा॥

    अर्थ: हनुमान का प्रताप चारों युगों, यानी सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग, में फैला है और जगत को उजाला देता है। परम्परा में हनुमान चिरंजीवी माने जाते हैं, और महाभारत में भीम से उनकी भेंट की कथा भी इसी विश्वास से जुड़ती है।

  32. चौपाई ३०

    साधु संत के तुम रखवारे।

    असुर निकंदन राम दुलारे॥

    अर्थ: हनुमान साधु-सन्तों के रखवाले हैं, असुरों का नाश करने वाले ('निकंदन', यानी जड़ से उखाड़ने वाले) हैं और राम के दुलारे हैं। एक ही चौपाई में उनके तीन रूप दिखते हैं: रक्षक, बुराई से लड़ने वाले योद्धा और प्रभु के प्रिय।

  33. चौपाई ३१

    अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

    अस बर दीन्ह जानकी माता॥

    अर्थ: माता जानकी, यानी सीता, ने हनुमान को वर दिया कि वे आठ सिद्धियों और नौ निधियों (दिव्य ख़ज़ानों) के दाता होंगे। सिद्धियों में अणिमा (अत्यन्त छोटा हो जाना) और महिमा (बहुत बड़ा हो जाना) गिनी जाती हैं। कुछ संस्करण 'दीन्ह' की जगह 'दीन' पढ़ते हैं; दोनों का अर्थ 'दिया' है।

  34. चौपाई ३२

    राम रसायन तुम्हरे पासा।

    सदा रहो रघुपति के दासा॥

    अर्थ: आयुर्वेद में 'रसायन' उस औषधि को कहते हैं जो शरीर को नया बल दे। कवि कहता है कि हनुमान के पास 'राम रसायन' है, यानी राम-भक्ति का अमृत। दूसरी पंक्ति का भाव है कि वे सदा रघुपति के दास बने रहें, या बने रहते हैं; व्याख्याकार दोनों अर्थ लेते हैं।

  35. चौपाई ३३

    तुम्हरे भजन राम को पावै।

    जनम जनम के दुख बिसरावै॥

    अर्थ: भक्तों का विश्वास है कि हनुमान का भजन करने वाला राम को पा लेता है और जन्म-जन्म के दुख भूल (बिसरा) जाता है। यहाँ हनुमान की भक्ति को राम तक पहुँचने का रास्ता बताया गया है।

  36. चौपाई ३४

    अंत काल रघुबर पुर जाई।

    जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥

    अर्थ: ऐसा भक्त जीवन के अन्त में रघुबर के पुर, यानी राम के धाम, जाता है, और अगर फिर जन्म ले तो जहाँ भी जन्मे, हरि का भक्त कहलाता है। यह पुनर्जन्म की हिन्दू धारणा पर टिकी आस्था है।

  37. चौपाई ३५

    और देवता चित्त न धरई।

    हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥

    अर्थ: कोई और देवताओं को मन में न भी लाए, तो भी केवल हनुमान की सेवा (सेइ) से उसे सब सुख मिल जाते हैं। व्याख्याकार प्रायः इसे दूसरे देवताओं का निरादर नहीं, बल्कि एक इष्ट के प्रति पूरी निष्ठा का भाव मानते हैं।

  38. चौपाई ३६

    संकट कटै मिटै सब पीरा।

    जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

    अर्थ: जो बलवान वीर हनुमान का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है। यह चौपाई २५ और २६ के भाव को दोहराती है।

  39. चौपाई ३७

    जय जय जय हनुमान गोसाईं।

    कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

    अर्थ: तीन बार जयकार करके कवि हनुमान को 'गोसाईं', यानी स्वामी, पुकारता है और विनती करता है कि वे गुरु की तरह (गुरुदेव की नाईं) कृपा करें। गुरु की कृपा में स्नेह के साथ सही राह दिखाना भी शामिल माना जाता है।

  40. चौपाई ३८

    जो सत बार पाठ कर कोई।

    छूटहि बंदि महा सुख होई॥

    अर्थ: जो कोई इसका सौ बार (सत, यानी शत) पाठ करे, वह बन्धन (बंदि) से छूट जाता है और उसे बड़ा सुख मिलता है। कुछ लोग बन्धन को क़ैद या संकट के अर्थ में लेते हैं, तो कुछ सांसारिक बन्धन के अर्थ में। इसी से विशेष अवसरों पर सौ या १०८ पाठ का चलन है।

  41. चौपाई ३९

    जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

    होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

    अर्थ: जो इस हनुमान चालीसा को पढ़ता है, उसे सिद्धि, यानी सफलता या आध्यात्मिक उपलब्धि, मिलती है, और इसके साक्षी (साखी) गौरीश, यानी पार्वती के पति शिव, हैं। रचना का नाम 'हनुमान चालीसा' स्वयं इसी चौपाई में आता है।

  42. चौपाई ४०

    तुलसीदास सदा हरि चेरा।

    कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

    अर्थ: यह कवि की छाप वाली चौपाई है, जिसमें रचनाकार अपना नाम जोड़ता है। तुलसीदास अपने को सदा हरि का चेरा, यानी सेवक, बताते हैं और विनती करते हैं: हे नाथ, मेरे हृदय में डेरा डालिए, यानी वहीं निवास कीजिए।

  43. अन्त का दोहा

    पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।

    राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

    अर्थ: अन्त के दोहे में हनुमान को पवनतनय (पवन के पुत्र), संकट हरने वाले और मंगल की मूर्ति कहकर पुकारा गया है। कवि प्रार्थना करता है कि वे राम, लक्ष्मण और सीता के साथ उसके हृदय में बसें। 'सुर भूप', यानी देवताओं में श्रेष्ठ, सम्बोधन भी प्रायः हनुमान के लिए माना जाता है।

रचना, रचनाकार और भाषा

परम्परा हनुमान चालीसा को गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, और चालीसवीं चौपाई में उनका नाम भी आता है। तुलसीदास सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के कवि थे, जिन्हें रामचरितमानस के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है। चालीसा की रचना का वर्ष ज्ञात नहीं है। तुलसीदास की जिन बारह रचनाओं को आम तौर पर प्रामाणिक माना जाता है, उनमें यह नहीं गिनी जाती, इसलिए कुछ विद्वान इसके रचयिता पर सवाल भी उठाते हैं।

एक लोकप्रिय कथा कहती है कि तुलसीदास ने चालीसा मुग़ल बादशाह अकबर की क़ैद में रची थी; इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। परम्परा वाराणसी के संकटमोचन हनुमान मन्दिर की स्थापना को भी तुलसीदास से जोड़ती है।

चालीसा की भाषा अवधी है, वही बोली जिसमें मानस लिखा गया। शब्द सरल हैं और लय ऐसी कि बच्चे भी इसे जल्दी याद कर लेते हैं। इसका पहला दोहा थोड़े-से वर्तनी-भेद के साथ मानस के अयोध्याकाण्ड के आरम्भ में भी आता है।

चालीसा की बनावट

'चालीसा' नाम चालीस से बना है, क्योंकि इसके केन्द्र में चालीस चौपाइयाँ हैं। उनसे पहले दो दोहे हैं और अन्त में एक दोहा, यानी कुल तैंतालीस छन्द। चौपाई ३९ में रचना स्वयं अपना नाम 'हनुमान चालीसा' लेती है।

विषय के हिसाब से देखें तो आरम्भ के दोहे गुरु-वन्दना और विनती हैं। शुरुआती चौपाइयाँ हनुमान के रूप, गुणों और नामों का वर्णन करती हैं, और उसके बाद की चौपाइयाँ राम-कथा में उनके कामों का, जैसे लंका-दहन, संजीवनी लाना और सुग्रीव व विभीषण की सहायता। लगभग बीसवीं चौपाई से भक्त के जीवन में उनकी कृपा की बात आती है, और अन्तिम चौपाइयों में पाठ की महिमा और कवि की विनती।

चालीसा में हनुमान के नाम

चालीसा में हनुमान को कई नामों से पुकारा गया है, और हर नाम उनकी किसी कथा या गुण की ओर इशारा करता है।

इनके अलावा महाबीर, कपीस (वानरों के स्वामी), राम दूत और गोसाईं जैसे सम्बोधन भी आते हैं।

बजरंगी
वज्र-अंगी से बना माना जाता है, यानी वज्र जैसे कठोर शरीर वाले (चौपाई ३)।
पवनसुत
पवन देव के पुत्र (चौपाई २)। आरम्भ के दोहे का पवनकुमार और अन्त के दोहे का पवनतनय भी यही अर्थ देते हैं।
अंजनि पुत्र
माता अंजना के पुत्र (चौपाई २)।
केसरीनंदन
वानर केसरी के पुत्र, जो अंजना के पति थे (चौपाई ६)।
शंकर सुवन
शिव के पुत्र (चौपाई ६)। परम्परा में हनुमान को शिव का अंश या रुद्र का अवतार माना जाता है, और यह नाम उसी भाव से जुड़ा है।

पाठ कब और कैसे होता है

बहुत-से लोग रोज़ सुबह या शाम हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। उत्तर भारत में मंगलवार और शनिवार हनुमान की उपासना के ख़ास दिन माने जाते हैं, और इन दिनों मन्दिरों में सामूहिक पाठ आम है। हनुमान जयन्ती पर भी बड़े पैमाने पर पाठ होता है; उत्तर भारत में यह प्रायः चैत्र पूर्णिमा को मनाई जाती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में दूसरी तिथियों पर।

चौपाई ३८ सौ बार पाठ की बात करती है, और इसी से कई भक्त विशेष अवसरों पर सौ या १०८ पाठ का संकल्प लेते हैं, अक्सर समूह में बाँटकर। पाठ के नियम परिवार और परम्परा के हिसाब से अलग-अलग हैं: कोई दीपक जलाकर हनुमान के चित्र के सामने बैठकर पढ़ता है, तो कोई यात्रा में या काम करते हुए मन ही मन।

पाठ-भेद: तासु या सोइ, दीन्ह या दीन

हनुमान चालीसा सदियों से मौखिक परम्परा में और अलग-अलग प्रकाशकों के ज़रिये चलती आई है, इसलिए इसके छपे रूपों में कहीं-कहीं छोटे अन्तर मिलते हैं। इस पृष्ठ का पाठ रामभद्राचार्य के तय किए पाठ पर आधारित है, जिसे अंग्रेज़ी विकिपीडिया के २०१३ के एक संस्करण से मिलाया गया है।

दो अन्तर ख़ास तौर पर ध्यान खींचते हैं। चौपाई २८ में यहाँ 'तासु' (उसका) है, जबकि कई लोकप्रिय संस्करणों में इसकी जगह 'सोइ' (वही) मिलता है। चौपाई ३१ में यहाँ 'दीन्ह' है, जहाँ कुछ संस्करण 'दीन' पढ़ते हैं; दोनों का अर्थ 'दिया' है। दोनों जगह भाव नहीं बदलता।

अगर आपका गुटका इनसे अलग है, तो उसे ग़लत मानने की ज़रूरत नहीं। सामूहिक पाठ में लोग प्रायः वही रूप पढ़ते हैं जो उनके मन्दिर या परिवार में चलता आया है।

चालीसा में आई कथाएँ

चालीसा बहुत कम शब्दों में राम-कथा और हनुमान से जुड़ी कई कथाओं की याद दिलाती है। ये चार कथाएँ सबसे ज़्यादा जानी जाती हैं।

इनके अलावा सुग्रीव को राम से मिलाने (चौपाई १६), विभीषण को सलाह देने (चौपाई १७) और सीता से वर पाने (चौपाई ३१) के प्रसंग भी आते हैं। इनमें से कुछ कथाएँ वाल्मीकि रामायण में मिलती हैं, तो कुछ बाद की परम्पराओं में विकसित हुईं, और अलग-अलग ग्रन्थों में उनके ब्योरे थोड़े बदल जाते हैं।

सूर्य को फल समझना
कथा के अनुसार बचपन में हनुमान ने उगते सूर्य को मीठा फल समझकर निगलने के लिए छलाँग लगाई (चौपाई १८)। 'हनुमान' नाम की एक व्याख्या इसी कथा में इन्द्र के वज्र से ठुड्डी (हनु) पर लगी चोट से जुड़ी है।
संजीवनी बूटी
लंका के युद्ध में लक्ष्मण के मूर्छित होने पर हनुमान हिमालय से संजीवनी लाए; बूटी न पहचान पाने पर वे पूरा पर्वत उठा लाए (चौपाई ११)।
लंका-दहन
रावण के आदेश पर हनुमान की पूँछ में आग लगाई गई, और उन्होंने उसी आग से लंका जला दी (चौपाई ९)।
राम की अँगूठी
राम ने सीता को पहचान दिलाने के लिए अपनी मुद्रिका हनुमान को दी, जिसे मुँह में रखकर वे समुद्र लाँघ गए (चौपाई १९)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हनुमान चालीसा किसने लिखी?

परम्परा के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास ने, जिनका नाम चालीसवीं चौपाई में आता है। रचना का वर्ष ज्ञात नहीं है, और कुछ विद्वान इसके रचयिता को लेकर सवाल उठाते हैं, पर भक्तों में यही मान्यता प्रचलित है।

हनुमान चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

चालीस। उनके साथ आरम्भ में दो दोहे और अन्त में एक दोहा है, इसलिए कुल छन्द तैंतालीस होते हैं।

हनुमान चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?

कोई एक तय समय नहीं है। बहुत-से लोग रोज़ सुबह या शाम पाठ करते हैं, और मंगलवार, शनिवार तथा हनुमान जयन्ती को इसका ख़ास महत्व माना जाता है। अपने परिवार या मन्दिर की परम्परा मानना सबसे सहज रास्ता है।

क्या चालीसा के पाठ से रोग दूर होते हैं?

चौपाई २५ भक्तों की इस आस्था को व्यक्त करती है कि हनुमान का जप पीड़ा हरता है। बहुत-से लोग कठिन समय में पाठ से मन का सहारा पाते हैं, पर यह आस्था का विषय है, इलाज का विकल्प नहीं।

यहाँ का पाठ मेरे गुटके से अलग क्यों है?

यह पाठ रामभद्राचार्य के तय किए पाठ पर आधारित है, और छपे संस्करणों में छोटे अन्तर आम हैं, जैसे चौपाई २८ में 'तासु' या 'सोइ'। ऐसे अन्तरों से भाव नहीं बदलता।

स्रोत

ऊपर दिया गया पाठ इन सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन) संस्करणों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। व्याख्या हमारी अपनी है।

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