रामायण हिन्दी में

इस पृष्ठ पर गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का आरम्भ, यानी बालकाण्ड का मंगलाचरण, मूल पाठ में है, हर छन्द के सरल हिन्दी अर्थ के साथ। साथ में पढ़िए कि मानस का वाल्मीकि रामायण से क्या सम्बन्ध है, इसके सात काण्ड कौन-से हैं और इसका पाठ कैसे होता है।

संस्करण:
बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग का रामचरितमानस (बालकाण्ड), हिन्दी विकिस्रोत पर उपलब्ध प्रति से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया; केवल तुलसीदास का मूल पाठ लिया गया है, संस्करण की टीका नहीं।
लिखा गया

रामचरितमानस, बालकाण्ड: मंगलाचरण

नीचे बालकाण्ड के आरम्भ के आठ छन्द हैं: संस्कृत के दो श्लोक, अवधी के पाँच सोरठे और मानस की पहली चौपाई; बीच के श्लोक २ से ६ अभी शामिल नहीं हैं। इस संस्करण में समास के हिस्से योजक चिह्न से अलग छपे हैं, जैसे 'करि-बर-बदन'; पाठ में इन्हें जोड़कर पढ़ा जाता है।

संस्करण: बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग का संस्करण (हिन्दी विकिस्रोत)

  1. श्लोक १

    वर्णानामर्थसङ्घानां रसानां छन्दसामपि।

    मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥

    अर्थ: मानस संस्कृत के इस श्लोक से खुलता है, जिसमें तुलसीदास वाणी (सरस्वती) और विनायक (गणेश) को एक साथ प्रणाम करते हैं। दोनों को वर्णों, अर्थों के समूह, रसों, छन्दों और मंगल के रचयिता कहा गया है, यानी कविता के हर अंग से जुड़े देवता।

  2. श्लोक ७

    नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।

    स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथाभाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥

    अर्थ: सातवें श्लोक में कवि अपना उद्देश्य बताता है: वह रघुनाथ की कथा 'स्वान्तःसुखाय', यानी अपने मन के सुख के लिए, 'भाषा' में रच रहा है, यानी संस्कृत की जगह लोकभाषा में। कथा पुराणों, निगम (वेद) और आगम से मेल खाती है, रामायण पर टिकी है और कुछ दूसरे स्रोतों से भी ली गई है।

  3. सोरठा १

    जेहि सुमिरत सिधि होइ, गन-नायक करि-बर-बदन।

    करउ अनुग्रह सोइ, बुद्धि-रासि सुभ-गुन-सदन॥

    अर्थ: पहला सोरठा गणेश को समर्पित है, जिनकी पहचान 'गन-नायक' (शिव के गणों के नायक) और 'करि-बर-बदन' (उत्तम हाथी जैसे मुख वाले) जैसे विशेषणों से होती है। सोरठा कहता है कि उनके स्मरण से काम सिद्ध होते हैं; कवि बुद्धि के भण्डार और शुभ गुणों के घर गणेश से अनुग्रह माँगता है।

  4. सोरठा २

    मूक होइ बाचाल, पङ्गु चढ़इ गिरिवर गहन।

    जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल-कलिमल-दहन॥

    अर्थ: यहाँ देवता का नाम नहीं लिया गया, केवल उनकी कृपा की महिमा है: वह मूक को वाचाल बना देती है और पंगु को ऊँचे, घने पहाड़ पर चढ़ा देती है। 'कलिमल-दहन' यानी कलियुग की मैल जलाने वाले। कई टीकाकार इसे सूर्य की वन्दना मानते हैं, पर इस पर एक राय नहीं है।

  5. सोरठा ३

    नील-सरोरुह-स्याम, तरुन-अरुन-बारिज नयन।

    करउ सो मम उर धाम, सदा छीर-सागर-सयन॥

    अर्थ: तीसरा सोरठा विष्णु का ध्यान है, जो 'छीर-सागर-सयन' हैं, यानी क्षीरसागर (दूध के समुद्र) में शयन करते हैं। उनका रंग नीले कमल (नील-सरोरुह) जैसा साँवला है और आँखें नए खिले लाल कमल (अरुन बारिज) जैसी। कवि की इच्छा है कि वे उसके हृदय को अपना धाम बना लें।

  6. सोरठा ४

    कुन्द-इन्दु-सम देह, उमा-रमन करुना-अयन।

    जाहि दीन पर नेह, करउ कृपा मर्दन-मयन॥

    अर्थ: चौथा सोरठा शिव की वन्दना है, जिनकी देह कुन्द के सफ़ेद फूल और चन्द्रमा जैसी उजली है; वे उमा के पति, करुणा के घर और दीनों से स्नेह रखने वाले हैं। 'मर्दन-मयन' यानी कामदेव को नष्ट करने वाले: कथा है कि ध्यान भंग करने आए कामदेव को शिव ने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिया।

  7. सोरठा ५

    बन्दउँ गुरु-पद-कञ्ज, कृपा-सिन्धु नर-रूप-हरि।

    महामोह-तम-पुञ्ज, जासु बचन-रबि-कर-निकर॥

    अर्थ: पाँचवाँ सोरठा गुरु के चरण-कमलों की वन्दना है। गुरु 'कृपा-सिन्धु' हैं और 'नर-रूप-हरि', यानी मनुष्य रूप में भगवान। महामोह घने अँधेरे का ढेर (तम-पुञ्ज) है और गुरु के वचन उसे मिटाने वाली सूर्य-किरणें। कुछ टीकाकार 'नर-रूप-हरि' में तुलसीदास के गुरु नरहरिदास के नाम का संकेत देखते हैं।

  8. चौपाई १

    बन्दउँ गुरु-पद-पदुम-परागा। सुरुचि-सुबास सरस अनुरागा॥

    अमिय मूरि-मय चूरन चारू। समन सकल-भव-रुज-परिवारू॥

    अर्थ: पहली चौपाई में गुरु-वन्दना आगे बढ़ती है। गुरु के चरण-कमलों की धूल कमल का पराग है, जिसमें सुन्दर कान्ति (सुरुचि), सुगन्ध (सुबास) और प्रेम का रस है। वही 'अमिय मूरि', यानी अमृत जैसी जड़ी, का चूर्ण है, जो 'भव-रुज', यानी संसार-रूपी रोग और उससे जुड़ी हर पीड़ा, को शान्त करता है।

रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण

मूल रामायण महर्षि वाल्मीकि का संस्कृत महाकाव्य है, जिसे परम्परा आदिकाव्य, यानी पहला काव्य, कहती है। तुलसीदास का रामचरितमानस उसका अनुवाद नहीं, बल्कि अवधी में कही गई स्वतन्त्र राम-कथा है, जिसे उत्तर भारत में बोलचाल में 'रामायण' ही कहा जाता है।

मानस में ही तुलसीदास बताते हैं कि उन्होंने यह कथा संवत १६३१, यानी सन् १५७४, में रामनवमी के दिन अयोध्या में शुरू की। नाम का अर्थ है राम के चरित का मानस, यानी सरोवर, और इसी रूपक से काण्डों को 'सोपान', यानी सीढ़ियाँ, भी कहा गया है।

जैसा मंगलाचरण के सातवें श्लोक में कवि खुद कहता है, कथा पुराणों, रामायण और दूसरे स्रोतों पर आधारित है; विद्वान इस पर अध्यात्म रामायण का प्रभाव भी मानते हैं। घटनाएँ मोटे तौर पर वही हैं, पर मानस में राम के ईश्वर होने और भक्ति पर कहीं ज़्यादा ज़ोर है।

मानस के सात काण्ड

वाल्मीकि रामायण की तरह मानस भी सात काण्डों में बँटा है; हर काण्ड संस्कृत श्लोकों से शुरू होता है और सबसे लम्बा बालकाण्ड है।

मानस का छठा काण्ड लंकाकाण्ड कहलाता है, जिसे वाल्मीकि रामायण में प्रायः युद्धकाण्ड कहा जाता है।

बालकाण्ड
शिव-पार्वती की कथा, राम का जन्म, धनुष-भंग और सीता से विवाह।
अयोध्याकाण्ड
कैकेयी के वर, राम का वनवास, दशरथ का देहान्त और भरत का पादुकाएँ लेकर लौटना।
अरण्यकाण्ड
वन का जीवन, सीता-हरण और शबरी से भेंट।
किष्किन्धाकाण्ड
हनुमान और सुग्रीव से भेंट, और बाली का वध।
सुन्दरकाण्ड
हनुमान का समुद्र लाँघना, सीता से भेंट और लंका-दहन।
लंकाकाण्ड
सेतु, युद्ध और रावण का वध।
उत्तरकाण्ड
राज्याभिषेक, रामराज्य और काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद। वाल्मीकि के उलट, इसमें सीता के परित्याग की कथा नहीं है।

चौपाई, दोहा और सोरठा

मानस का ज़्यादातर हिस्सा चौपाई में है। चौपाई के चार चरण होते हैं और हर चरण में सोलह मात्राएँ; मोटे तौर पर छोटे स्वर की एक मात्रा गिनी जाती है और लम्बे की दो। बीच-बीच में आने वाला दोहा या सोरठा कथा को पड़ाव देता है।

दोहे की हर पंक्ति में पहले तेरह और फिर ग्यारह मात्राएँ होती हैं; सोरठा इसका उल्टा है, और उसकी तुक ग्यारह मात्रा वाले हिस्सों में मिलती है, जैसे पहले सोरठे में 'होइ' और 'सोइ'। यह शैली जायसी के पद्मावत जैसे अवधी सूफ़ी काव्यों में पहले से थी। पहला संस्कृत श्लोक अनुष्टुप छन्द में है और सातवाँ वसन्ततिलका में।

मंगलाचरण में किसकी वन्दना है

ग्रन्थ के आरम्भ में देवताओं और गुरु की वन्दना को मंगलाचरण कहते हैं। मानस के सात संस्कृत श्लोकों में सरस्वती और गणेश, भवानी-शंकर, गुरु, वाल्मीकि और हनुमान, सीता और राम की वन्दना है; सातवें में कवि अपना उद्देश्य बताता है।

पाँच अवधी सोरठों में पहला गणेश, तीसरा विष्णु, चौथा शिव और पाँचवाँ गुरु को समर्पित है। दूसरे में देवता का नाम नहीं है, इसलिए टीकाकार उसकी पहचान अलग-अलग करते हैं; बहुत-से उसे सूर्य मानते हैं।

मानस का पाठ कैसे होता है

मानस पढ़ा भी जाता है और गाया भी, और इसकी बहुत-सी पंक्तियाँ कहावतों की तरह बोलचाल में आ गई हैं।

पाठ की ये चार परम्पराएँ सबसे जानी-पहचानी हैं।

नियमित पाठ
रोज़ कुछ चौपाइयाँ पढ़ना; पूरा ग्रन्थ नौ दिन में पढ़ना नवाह्न पारायण और महीने भर में पढ़ना मास पारायण कहलाता है।
अखण्ड पाठ
कई लोग बारी-बारी से, बिना रुके पूरा मानस पढ़ते हैं; यह पाठ प्रायः एक दिन-रात में पूरा होता है।
रामलीला
दशहरे के आसपास का मंचन, जिसके संवाद और गायन मोटे तौर पर मानस पर टिके होते हैं; रामनगर (वाराणसी) की रामलीला प्रसिद्ध है।
सुन्दरकाण्ड का पाठ
हनुमान की लंका-यात्रा वाले काण्ड का अलग पाठ, ख़ासकर मंगलवार और शनिवार को।

इस पृष्ठ पर केवल आरम्भ क्यों है

हम वही पंक्तियाँ छापते हैं जो किसी सार्वजनिक संस्करण से मिलाई जा सकी हों; यहाँ वह संस्करण बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग का है, और उसकी टीका नहीं, केवल तुलसीदास का पाठ लिया गया है।

स्कैन में पहली चौपाई तक की पंक्तियाँ बिना सन्देह पढ़ी जा सकीं, इसलिए अंश वहीं रुकता है; आगे का पाठ जाँच के बाद जुड़ेगा। वर्तनी भी उसी संस्करण की है, जैसे 'पङ्गु' और 'कञ्ज'।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या रामचरितमानस ही रामायण है?

बोलचाल में हाँ, पर ग्रन्थ के रूप में नहीं। मूल रामायण वाल्मीकि की संस्कृत रचना है, जबकि रामचरितमानस तुलसीदास की अवधी में कही गई स्वतन्त्र राम-कथा है।

रामचरितमानस किस भाषा में है?

मुख्य रूप से अवधी में, जो आज के उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र की बोली है। हर काण्ड के आरम्भ में कुछ श्लोक संस्कृत में हैं, जैसे इस पृष्ठ के पहले दो छन्द।

अखण्ड पाठ और नवाह्न पारायण में क्या अन्तर है?

अखण्ड पाठ में पूरा मानस एक बार में, बिना रुके पढ़ा जाता है; नवाह्न पारायण में वही पाठ नौ दिनों में बाँटा जाता है, अक्सर नवरात्र में।

दूसरे सोरठे में किस देवता की वन्दना है?

सोरठे में नाम नहीं दिया गया है। बहुत-से टीकाकार इसे सूर्य की वन्दना मानते हैं, जबकि कुछ इसे दूसरे देवताओं से जोड़ते हैं।

स्रोत

ऊपर दिया गया पाठ इन सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन) संस्करणों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। व्याख्या हमारी अपनी है।

हिन्दी में हिन्दू धर्म के अन्य ग्रन्थ